मुक्तक 1.

फूंक दिए है तुमने मंतर हर मौसम के कानों में ,
अपनी जीवटता से जिंदा हम आंधी तूफानों में ,
ऐसी भूख जगी पीड़ा को यायावर सा जीवन ले ,
मन चरवाहा  घूम रहा है  यादों के  मैदानों में ।

– राम लखारा ‘विपुल’