एक मेरा मन था कि जिसने – Ram Lakhara Vipul

पूजा की सामग्री लेकर खड़े सैकड़ो व्रत धारी जब
एक मेरा मन था कि जिसने गीतों का उपवास लिया था

प्रण पालन का भार पड़ा था
ममता का आकार बड़ा था
निष्ठा बौनी स्वार्थ के आगे
सच चुप हो लाचार खड़ा था

नदी के तट तक दे विदाई अपने घर को लौट गये सब
एक मेरा मन था कि जिसने चैदह वर्ष वनवास लिया था

जब हवाएं धुंध में लिपटी
संग धूप के ज्वाला गिरती
ऐसी सीमित सोच हुई के
भावना भी अर्थ में सिमटी

वातानुकूलित घर में जब भूले सब बदली ऋतुओं को
तब इस मन ने आगे बढकर जला हुआ मधुमास लिया था

 

_ Ram Lakhara Vipul

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मुक्तक 1.

फूंक दिए है तुमने मंतर हर मौसम के कानों में ,
अपनी जीवटता से जिंदा हम आंधी तूफानों में ,
ऐसी भूख जगी पीड़ा को यायावर सा जीवन ले ,
मन चरवाहा  घूम रहा है  यादों के  मैदानों में ।

– राम लखारा ‘विपुल’